
अनुच्छेद 32 देता है अधिकार’: सुप्रीम कोर्ट नाबालिग से रेप और हत्या के दोषी की मौत की सजा पर करेगा पुनर्विचार
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Shweta
- August 27, 2025
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग रेप-हत्या सजा पर पुनर्विचार की प्रक्रिया शुरू की
नागपुर में हुई भयावह घटना में वसंत संपत दुपारे ने नाबालिग बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर उसके साथ दुष्कर्म किया और उसके बाद उसकी हत्या कर दी। आरोपी ने बच्ची के चेहरे को विकृत कर उसकी पहचान छुपाने का प्रयास भी किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, मृत्युदंड की सजा पर अनुच्छेद 32 अधिकार के तहत पुनर्विचार करने का रास्ता खोल दिया है।
मामला और दोषसिद्धि
यह घटना साल 2008 की है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, वसंत संपत दुपारे ने चार साल की नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार किया और फिर उसकी हत्या कर दी। दुष्कर्म के बाद आरोपी ने बच्ची के चेहरे को विकृत कर पहचान छुपाने की कोशिश की।
सुप्रीम कोर्ट ने वसंत संपत दुपारे की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा को लेकर नई दिशानिर्देशों के पालन की जांच के लिए मामले को पुनर्विचार के लिए भेजा। वर्ष 2022 में दुपारे को मौत की सजा सुनाई गई थी। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उस समय कोर्ट ने मौत की सजा के लिए निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच की दलील
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि मौत की सजा के समय तय दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया, तो नाबालिग रेप-हत्या सजा पर पुनर्विचार किया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मृत्युदंड पाए व्यक्ति को समान व्यवहार और निष्पक्ष प्रक्रिया के अनुच्छेद 32 अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 32 प्रत्येक व्यक्ति को प्रक्रियात्मक सुरक्षा का अधिकार देता है। इस अधिकार के तहत मृत्युदंड पाए आरोपी के मामले में सजा सुनाने की प्रक्रिया पर पुनर्विचार किया जा सकता है, खासकर तब जब यह सुनिश्चित न किया गया हो कि सभी दिशानिर्देशों का पालन हुआ है।
दिशा-निर्देश और मनोवैज्ञानिक आकलन
सुप्रीम कोर्ट ने मनोज बनाम मध्य प्रदेश मामले (2022) का हवाला देते हुए कहा कि मृत्यु दंड देने से पहले अभियुक्त का मनोरोग और मनोवैज्ञानिक आकलन अनिवार्य है। इस मामले में भी यह जांच महत्वपूर्ण मानी गई है। बेंच ने कहा कि भारतीय संविधान अनुच्छेद 32 के तहत कोर्ट को मृत्युदंड संबंधी मामलों में सजा पर पुनर्विचार करने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नाबालिग से रेप केस में दोषी को मौत की सजा देने से पहले सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन होना आवश्यक है। यह कदम न्याय प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करता है।
याचिकाओं का इतिहास
वसंत संपत दुपारे की मौत की सजा की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट ने 26 नवंबर, 2014 को की थी। इसके बाद उसकी पुनर्विचार याचिका तीन मई, 2017 को खारिज कर दी गई थी। दुपारे ने महाराष्ट्र के राज्यपाल और राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिकाएं भी दायर कीं, जिन्हें 2022 और 2023 में खारिज कर दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 32 अधिकार का हवाला देते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए अनुमति दी है।
इस कदम से यह स्पष्ट होता है कि नाबालिग रेप-हत्या सजा में आरोपी को निष्पक्ष और समान व्यवहार का अधिकार संविधान के तहत हमेशा सुरक्षित रहेगा। यह भारतीय संविधान अनुच्छेद 32 का सर्वोच्च न्यायिक उपयोग है, जो मृत्युदंड जैसे संवेदनशील मामलों में न्याय सुनिश्चित करता है।
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Frequently Asked Questions
Q1. अनुच्छेद 32 क्या है और यह नागरिकों को कौन से अधिकार देता है?
Ans. अनुच्छेद 32 भारतीय संविधान का हिस्सा है, जो नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में प्रत्यक्ष याचिका दायर करने का अधिकार देता है।
Q2. सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग से रेप और हत्या के दोषी की मौत की सजा पर पुनर्विचार क्यों किया?
Ans. क्योंकि यह जांचने की जरूरत थी कि मौत की सजा के समय सभी प्रक्रियात्मक दिशानिर्देश और सुरक्षा उपायों का पालन हुआ या नहीं।
Q3. क्या अनुच्छेद 32 का इस्तेमाल केवल भारतीय नागरिक ही कर सकते हैं?
Ans. हाँ, अनुच्छेद 32 का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को ही है।
Q4. सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग से रेप और हत्या के दोषी की मौत की सजा पर पुनर्विचार क्यों करने का फैसला किया?
Ans. सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए फैसला किया कि दोषी को समान व्यवहार और निष्पक्ष प्रक्रिया मिले और मनोवैज्ञानिक/मनोवैज्ञानिक आकलन जैसे निर्देशों का पालन हुआ हो।
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