
कब से शुरू हो रहा पितृपक्ष? जानें क्या है श्राद्ध के सही नियम
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Manjushree
- August 29, 2025
Pitrapaksh 2025: हिन्दू धर्म में पितृपक्ष का विशेष मान्यता है। जो पितृ पक्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से प्रारंभ होता है। पितृ पक्ष को पूर्वजों का श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। पूर्वजों के आत्मा के शांति और मुक्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। पितृ पक्ष के इन 15 दिनों की अवधि में पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए तर्पण जैसा विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। पितृपक्ष पितरों को समर्पित १६ दिनों की एक अवधि होती है।
पितृपक्ष की तिथि 2025
वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा 07 सितंबर को पड़ रही है और यह देर रात 01 बजकर 41 मिनट शुरू होगी। पूर्णिमा की तिथि का समापन उसी दिन रात 11 बजकर 38 मिनट पर समाप्त भी हो जाएगा। इस बार पितृ पक्ष 7 सितंबर को शुरू होंगे और 21 सितंबर 2025 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा।
पितृपक्ष का महत्व
पितृ पक्ष में किया गया श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान दिवंगत पितरों की आत्मा को शांति प्रदान करता है और उन्हें सांसारिक मोह-माया से मुक्ति दिलाकर मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। यह अवधि पितृ दोष से छुटकारा पाने के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। विधि-विधान से श्राद्ध करने से पितरों की नाराजगी दूर होती है और उनके आशीर्वाद से जीवन की समस्याएं हल होती हैं। पितृ पक्ष का मुख्य उद्देश्य पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करना है। मान्यता है कि इस दौरान पूर्वज धरती पर आते हैं और वे अपने वंशजों द्वारा किए जा रहे कार्यों को देखते हैं। शास्त्रों में पितृ ऋण को तीन मुख्य ऋणों में से एक माना गया है। पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण करके संतानें इस पितृ ऋण से मुक्ति पा सकती है।
पितृ पक्ष में श्राद्ध विधि
- श्राद्ध के लिए एक पवित्र स्थान चुनें और उसे अच्छी तरह साफ करें।
- श्राद्ध करने वाले को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए।
- पितरों का नाम लेकर उन्हें आमंत्रित करें।
- जल, तिल और कुश का प्रयोग करके पितरों को जल अर्पण करें।
- चावल, जौ और घी से बने पिंड तैयार करें और उन्हें पितरों को अर्पित करें।
- ब्राह्मणों को भोजन कराएं, उन्हें वस्त्र और दक्षिणा दें।
- अंत में परिवार के साथ श्राद्ध भोजन ग्रहण करें।
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पितृ पक्ष में श्राद्ध के नियम
- श्राद्ध हमेशा पितरों की मृत्यु तिथि पर ही किया जाता है। अगर आपको अपने पितरों की मृत्यु की तिथि याद न हो तो सर्व पितृ अमावस्या पर श्राद्ध कर्म कर सकते हैं।
- श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान-दक्षिणा देना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
- पितृ पक्ष में प्रतिदिन जल, तिल और कुशा से पितरों का तर्पण किया जाता है। तर्पण करते समय उनका नाम लेकर जल अर्पित किया जाता है।
- इस दौरान घर में सात्विक भोजन ही बनाना चाहिए और मांस, मदिरा, व किसी भी तरह के तामसिक भोजन से बचना चाहिए।
- पितृ पक्ष में जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और अन्य आवश्यक चीजों का दान करना चाहिए। इससे पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है।
- श्राद्ध कर्म किसी पवित्र स्थान, जैसे गंगा घाट आदि पर करना अधिक फलदायी माना जाता है।
- श्राद्ध करते समय क्रोध, उतावलेपन और घृणा का भाव नहीं रखना चाहिए।
पितृ पक्ष में ये न करें
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में नया सामान नहीं खरीदना चाहिए। पितृ पक्ष में शुभ कार्य शादी, सगाई, मुंडन और उपनयन वर्जित होते हैं। वहीं, पितृ पक्ष में नए वस्त्र भी नहीं खरीदने चाहिए, क्योंकि, पितृ पक्ष में कपड़ों का दान पूर्वजों के लिए होता है। इस दौरान अन्न और वस्त्रों का दान करने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं। कुछ लोग तो बाल,दाढ़ी और मुछे भी नहीं कटवाते।
2025 पितृ पक्ष की तिथियां
श्राद्ध/पूर्णिमा श्राद्ध: 7 सितंबर 2025, रविवार
प्रतिपदा श्राद्ध: 8 सितंबर 2025, सोमवार
द्वितीया श्राद्ध: 9 सितंबर 2025, मंगलवार
तृतीया श्राद्ध: 10 सितंबर 2025, बुधवार
चतुर्थी श्राद्ध: 11 सितंबर 2025, गुरुवार
पंचमी श्राद्ध: 12 सितंबर 2025, शुक्रवार
षष्ठी श्राद्ध: 13 सितंबर 2025, शनिवार
सप्तमी श्राद्ध: 14 सितंबर 2025, रविवार
अष्टमी श्राद्ध: 15 सितंबर 2025, सोमवार
नवमी श्राद्ध: 16 सितंबर 2025, मंगलवार
दशमी श्राद्ध: 17 सितंबर 2025, बुधवार
एकादशी श्राद्ध: 18 सितंबर 2025, गुरुवार
द्वादशी श्राद्ध: 19 सितंबर 2025, शुक्रवार
त्रयोदशी श्राद्ध: 20 सितंबर 2025, शनिवार
चतुर्दशी श्राद्ध: 21 सितंबर 2025, रविवार
सर्वपितृ अमावस्या: 21 सितंबर 2025, रविवार
श्राद्ध कर्म दोपहर के समय, खासकर कुतप काल (सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक) में करना शुभ माना जाता है, क्योंकि इस समय पितरों को विशेष संतुष्टि मिलती है। इस मुहूर्त को "कुतुप बेला" भी कहते हैं, जो दिन का आठवां प्रहर होता है।
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Frequently Asked Questions
Q1. पितृपक्ष 2025 कब से शुरू हो रहा है?
Ans. वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा 07 सितंबर, 2025 को पड़ रही है।
Q2. पितृपक्ष 2025 की समाप्ति कब होगी?
Ans. 21 सितंबर 2025 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा।
Q3. पितृपक्ष और श्राद्ध में क्या अंतर है?
Ans. पितृपक्ष पितरों को समर्पित १६ दिनों की एक अवधि है, जबकि श्राद्ध उस अवधि के दौरान पूर्वजों के प्रति श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्मकांड हैं, जिनमें पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज आदि शामिल होते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो पितृपक्ष वह समय है और श्राद्ध वह कार्य है, जिसे उस समय में किया जाता है।
Q4. श्राद्ध करने के सही नियम क्या हैं?
Ans. श्राद्ध हमेशा पितरों की मृत्यु तिथि पर ही किया जाता है। अगर आपको अपने पितरों की मृत्यु की तिथि याद न हो तो सर्व पितृ अमावस्या पर श्राद्ध कर्म कर सकते हैं। श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान-दक्षिणा देना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
Q5. श्राद्ध कर्म किस समय करना शुभ माना जाता है?
Ans. श्राद्ध कर्म दोपहर के समय, खासकर कुतप काल (सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक) में करना शुभ माना जाता है, क्योंकि इस समय पितरों को विशेष संतुष्टि मिलती है। इस मुहूर्त को "कुतुप बेला" भी कहते हैं, जो दिन का आठवां प्रहर होता है।
Q6. पितृपक्ष में कौन-सी चीजें दान करनी चाहिए?
Ans. पितृपक्ष में आप अन्न (गेहूं, चावल), गुड़, नमक, सफेद मिष्ठान, सफेद वस्त्र, जूते-चप्पल, छाता, गाय का घी और भूमि का दान कर सकते हैं। इन चीजों का दान करने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं।
Q7. पितृपक्ष के दौरान क्या नहीं करना चाहिए?
Ans. मांस, मदिरा, व किसी भी तरह के तामसिक भोजन से बचना चाहिए।नया वस्त्र या सामान नहीं खरीदना चाहिए। पितृ पक्ष में शुभ कार्य शादी, सगाई, मुंडन और उपनयन वर्जित होते हैं।
Q9. क्या पितृपक्ष में घर पर श्राद्ध किया जा सकता है?
Ans. हां, शास्त्रोक्त विधि-विधान से श्राद्ध कर्म किया जा सकता है।
Q10. पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण का महत्व क्या है?
Ans. श्राद्ध और तर्पण, पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने वाले अनुष्ठान हैं, जिनका उद्देश्य आत्माओं को शांति और मोक्ष प्रदान करना होता है। तर्पण में पूर्वजों को जल और तिल अर्पित किए जाते हैं, जबकि श्राद्ध एक विस्तृत कर्मकांड है जिसमें भोजन अर्पित करना, हवन और दान जैसी गतिविधियाँ शामिल होती हैं।
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